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PATHALGAON
27 Aug 2026
कागजों में बाल विवाह पर पहरा, हकीकत में नाबालिग बनी मां!
Rajesh Agarwal
Khabar Hatkar Verified Reporting Desk
पत्थलगांव सिविल अस्पताल में नाबालिग ने दिया जुड़वा बच्चों को जन्म,
कागजों में बाल विवाह पर पहरा, हकीकत में नाबालिग बनी मां!
पत्थलगांव सिविल अस्पताल में नाबालिग ने दिया जुड़वा बच्चों को जन्म, एक नवजात की मौत; दूसरा ऑक्सीजन पर अंबिकापुर रेफर
पत्थलगांव। छत्तीसगढ़ में बाल विवाह रोकने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से जागरूकता अभियान, बैठकें, प्रचार-प्रसार और विभिन्न योजनाएं चलाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन पत्थलगांव सिविल अस्पताल से सामने आया एक मामला इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवालिया निशान लगा रहा है।
सिविल अस्पताल में एक नाबालिग बालिका ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। प्रसव के बाद एक नवजात की मौत हो गई, जबकि दूसरे नवजात की हालत गंभीर बताई जा रही है। उसे ऑक्सीजन पर रखा गया और बेहतर उपचार के लिए अंबिकापुर रेफर कर दिया गया। प्रसूता को भी अंबिकापुर रेफर किए जाने की जानकारी सामने आई है।
मामले की जानकारी अस्पताल की एक सजग एवं जागरूक नर्स ने तत्काल पत्थलगांव पुलिस को दी। नर्स ने पुलिस को बताया कि प्रसूता नाबालिग है और उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है, जिसमें एक नवजात की मौत हो चुकी है तथा दूसरा ऑक्सीजन पर है।
सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू की। पत्थलगांव थाना प्रभारी विनीत पांडे ने बताया कि मामले में विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण जीरो में दर्ज किया गया है। मामला दूसरे थाना क्षेत्र से संबंधित होने के कारण संबंधित थाना पुलिस को इसकी सूचना दे दी गई है।
अब सवाल योजनाओं से ज्यादा निगरानी पर है
बाल विवाह रोकने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से करोड़ों रुपये खर्च कर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। गांव-गांव बैठकों, पोस्टर-बैनर और कार्यक्रमों के जरिए बाल विवाह के खिलाफ संदेश दिए जाते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि एक नाबालिग बालिका विवाह के बाद गर्भवती होने तक विभागीय निगरानी तंत्र की नजर में क्यों नहीं आई?
क्या बाल विवाह रोकथाम की व्यवस्था सिर्फ फाइलों में सक्रिय है? क्या जागरूकता अभियान का मतलब केवल कार्यक्रम आयोजित करना और रिपोर्ट तैयार करना रह गया है? अगर विभागीय टीम और स्थानीय निगरानी तंत्र समय रहते सक्रिय होता, तो शायद यह स्थिति सामने ही नहीं आती।
फाइलों में योजनाएं, अस्पताल में हकीकत!
विडंबना यह है कि जिस उम्र में एक बच्ची को स्कूल, किताबों और अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए, उसी उम्र में उसे प्रसव जैसी गंभीर परिस्थिति से गुजरना पड़ा। जुड़वा बच्चों में से एक की मौत और दूसरे का ऑक्सीजन पर जिंदगी के लिए संघर्ष इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है—बाल विवाह रोकने के लिए जिम्मेदार विभाग की टीम आखिर कर क्या रही थी?
अस्पताल की नर्स की सजगता से मामला पुलिस तक पहुंच गया, लेकिन यह घटना महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर है। अब जरूरत सिर्फ कागजी कार्रवाई की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि नाबालिग का विवाह कैसे हुआ, संबंधित अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी और बाल विवाह रोकथाम की व्यवस्था में चूक कहां हुई।
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